महान्‌ संत

    आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने धार्मिक एवं बौद्धिक जगत्‌ के बीच नये क्षितिज उद् घाटित किए और एक प्रतिष्ठित संत के रूप में उभरे। उनका नाम बीसवीं शताब्दी के अध्यात्म के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। अपने मौलिक विचारों एवं समस्या के समाधान की अपनी प्रभावी शैली के लिए वे सुविख्यात है। उनकी असाधारण प्रतिभा ने विज्ञान एवं अध्यात्म को परस्पर पर्याय के रूप प्रस्तुत किया है। धार्मिक क्षेत्र में यह पूर्णतः नया सिद्धांत है जिसने धर्म के संदर्भ में नई दिच्चा दी है।

 

    विन्रमता, दया, समझ, विवेक, धैर्य और विश्‍व भ्रार्तृत्व उनके दिव्य गुण हैं। प्रज्ञा व ज्ञान के स्त्रोत आचार्य महाप्रज्ञ प्रतिदिन अपने मौलिक व नवीन विचारों से ज्ञान पिपासुओं की प्यास बुझाते हैं। वे एक ऐसे रत्नमणि है जो समस्त संसार में भारत के सांस्कृतिक एवं पारंपरिक मूल्यों को वृद्धिंगत कर रहे हैं।

     डा. ए. एल. भसीम के शबदों में – ‘आचार्य महाप्रज्ञ से मिलने वाला हर व्यक्ति उन्हें ‘अध्यात्मिक आदर्श’ के रूप में पाता है’।

     आचार्य महाप्रज्ञ जो उपदेश देते हैं उसका हमेश प्रयोग करते हैं। उनके चिंतन एवं दृष्टिकोण को विभिन्न् समसामयिक समस्याओं के कारगर इलाज के रूप में विचार किया जाता है। उन्होंने अपने विचारों को मात्र वैचारिक स्तर पर ही नहीं रखा बल्कि व्यवहार में परिणत किया हैं।

     आचार्य महाप्रज्ञ एक सिद्धांत मंत्र साधक है और उन्होंने अद्वितीय शक्तियां अर्जित की है। ये शक्तियां सम्यग्‌ मंत्र साधना से ही प्राप्त की जा सकती हैं।